Tuesday, January 12, 2016

नारी: Naari...



माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “नारी ”


वो हमको इस दुनिया मे लायी
अपना अमृतमयी नीर पिलाकर पाला पोषा
अपना सुख दुख भुलाकर पूरा स्नेह लुटा दिया
हमारे हर एक आँसू, हर एक दर्द पर
वो सौ-सौ आँसू रोई है
हमारी हर एक मुस्कान पे
उसने कई कई जीवन जियें है
आज भी हमारी हर सिसकी पर
वो कुल-मुला उठती है
नारी का यह रूप ‘माँ’ सच में अतुल्य है ।।


हमारी तरह ही वो हर काम करने मे सक्षम है
फिर भी बाबू जी को एक आँख ना सुहाती है
बस लड़की होना ही उसका क़सूर है
लिखने-पढ़ने का उसका मन तो है
पर सब कहते है क़ि लड़कियाँ पढ़ कर क्या करेंगी
इसलिए ही कहने से डरती है
सुबह-शाम बस घर के ही कामों मे उलझी रहती है
घर की चार-दीवारी ही बस उसका संसार है
इस घुटे घुटे बचपन मे भी उसमे उमंगे बाकी है
राखी के दिन वो सुबह से हमारा इंतज़ार करती है
बस हमारी एक मुस्कान भर से ही वो चहक उठती है, खिल उठती है
नारी का यह रूप ‘बहन’ सच मे न्यारा है ।।


हमारा हर सुख-दुख, अब उसका भी सुख-दुख है
हमारी हर ज़िम्मेदारी, अब उसकी भी ज़िम्मेदारी है
दुख की पथरीली राहों पर वो हमारे साथ साथ चली है
कई कई बार उसने हमे संभाला है, हौसला दिया है
हमने साथ साथ जीनें और साथ साथ मरने की कसमें खाई है
जीवनसंगिनी हमारी हमसाया, हमनवा, हमराज़ है
नारी के इस रूप के बिना जिंदगी बस एक कोरा सपना है ।।


लेकिन अज़ीब से हालात हैं, एक अज़ीब घुटन सी है
यह कैसा समाज़ है, इसके सब उलटे रिवाज़ है
बेटे के जन्म पर घरों मे खुशियाँ, लेकिन
बेटी के जन्म पर मातम है
बेटे के जन्म पर पिता को बधाइयाँ और
बेटी के जन्म पर माँ को सज़ाए है
धरती मे जो बीज़ बोया जाता है वो ही पौधा अंकुरित होता है
फिर क्यों कई माताएँ आज भी पीड़ित होती है
क्यों कई बहुएँ बेटीयाँ जनने पर जला दी जाती है
इस देश मे ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ जैसे उद्घोष गूंजते है
हम वही लोग है जो दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती को पूजते है
फिर क्यों कई बेटीयों की जन्म से पहले या बाद मे हत्या कर दी जाती है
क्यों कई लड़कियों का बचपन घरों की चार-दीवारी मे क़ैद है ।।


यदि यही रहा व्यवहार पुरुष का, तो अंत निकट है
नारी बिन यह मनुज जीवन तो बस कल्पित है
यही समय है जागो, ना अपना काल बुलाओ
सृष्टि के अनमोल सृजन ‘नारी’ को ना ठुकराओ ।।


बेटी बचाओ
बेटी पढ़ाओ ।।


इसी संदर्भ मे कवि ‘द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी’ के
खंडकाव्य ‘सत्य की जीत’ से दो पंक्तियाँ :

“पुरुषों के पौरुष से ही नही बनेगी यह धरा स्वर्ग ,
चाहिए नारी का नारित्व तभी होगा यह पूरा सर्ग ।। ”