Monday, December 5, 2016

मैं चाहता हूँ: Mein Chahta Hun...


माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “ मैं चाहता हूँ

चाहता हूँ कि ज़ी भर के तेरे रुख़ को देखूँ,
तेरी झील सी आँखो मे तैरना चाहता हूँ ।।
चाहता हूँ तेरे लबों पे लब रखना,
तुझको अपनी बाहों मे जकड़ना चाहता हूँ ।।
चाहता हूँ तेरे भीगें बदन को चुमू,
तेरी उलझी लट मे उलझना चाहता हूँ ।।
चाहता हूँ तेरी सोखी, तेरे भोलेपन को,
जब तू सोये, दीदार-ए-चाँद करना चाहता हूँ ।।
चाहता हूँ ख़ुदा से तुझको फिर मांगू,
तुझको सारे जहान से चुराना चाहता हूँ ।।
चाहता हूँ सितमगर तुझको इश्क़ की इंतहा तक,
तुझको अपनी इबादत बनाना चाहता हूँ ।।
चाहता हूँ तेरी मिट्टी मे मिट्टी होना,
तुझको अपनी रूह मे समाना चाहता हूँ ।।

मैं तुमको चाहता हूँ...

Tuesday, January 26, 2016

आइए फिर से लें यही शपथ: Aaiye Fir Se Le Yahi Shapath…

नमस्कार,

आप सभी देशवासियों को ६७वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

आप सभी जानते है कि, जनवरी २६, १९५० को भारतीय गणतंत्र का जन्म हुआ। लेकिन क्यों?
इसकी क्या आवश्यकता थी?
क्या आज़ाद होना ही काफ़ी नही था?
आख़िर क्यों हमारे पूर्वजों ने ३ वर्ष के मंथन के बाद एक क्लिष्ट और नीरस पुस्तक की रचना की?

इस प्रश्न के अनेक उत्तर हो सकते हैं, और उनमें से कुछ सरलतम एवम् प्रवाभी तर्को से आप परिचित भी हैं।
पिछले ६० सालों में, काफ़ी हद तक संविधान मे निहित विचारों से देश के नागरिकों मे न्याय, स्वतन्त्रा, एवम् समानता की भावनाओं और राष्ट्र-बंधुता मे आशातीत बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इस सब के बाबजूद भी देश मे धर्म और जाति के नाम पर होने वाली हिंसाओं मे साल-दर-साल बढ़ोतरी हो रही है। संविधान की कुछ कमज़ोरियों और जनता की कम साक्षरता की वजह से कुछ लोग आज भी अपनी रोटियाँ सेकने मे लगे है। 
कुछ कहते है कि, देश मे हिंदू सुरक्षित नही है..
कुछ कहते है कि, देश मे मुस्लिम सुरक्षित नही है..
कुछ कहते है कि, देश मे दलित सुरक्षित नही है..
और कुछ संपन्न लोग कहते है कि, देश मे उनका परिवार सुरक्षित महसूस नही कर रहा है..
आख़िर क्या है ये सब?
इतिहास गवाह है कि, जब जब देश पर या देश के किसी भी परिवार पर कोई विपत्ति आई है, तब तब इस तरह की मानसिकता वाले लोगो ने केवल अराजकता फैलाने का ही काम किया है।

जब देश मे बम धमाके होते है, जब देश पर कोई प्राकर्तिक आपदा आ पड़ती है, तो उनका कहर कोई धर्म या कोई जाति देखे बिना हम सब पर टूट पड़ता है। हम किसी भी जाति, किसी भी धर्म के लोग हो, लेकिन जब हमारे जवान देश के लिए शहीद होते है, तो हम सबकी आँखे नम होती है। जब देश अनेक वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं मे प्रथम आता है तो हम सब एक साथ गौरव का अनुभव करते है।

देश मे कुछ इस तरह के असामाजिक तत्व हैं, जो समाज को बाटने का काम करके देश के आधारभूत ढ़ाचे पर चोट करते रहते हैं। हमे इस तरह के असामाजिक लोगो से बचना चाहिए। यह समय है जब देश प्रगती के पथ पर तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा है, लेकिन यह सावधानी बरतने का भी समय है। जाति और धर्म के नाम पर हुई एक भी चूक, देश की तरक्की के मार्ग मे अवरोध पैदा कर सकती है।

हमे विश्व के इतिहास से यह बात तो ज़रूर ही सीखनी चाहिए कि, समाज को विकास और न्याय उनकी सरकारों या उनके शासकों से नही मिलता, बल्कि विकास और न्याय मिलता है उस समाज की सोच से, उस समाज या देश के नागरिकों के आधारभूत मानव मूल्यों से। किसी भी देश की सरकार या शासक वैसे ही होगें, जैसी वहाँ की जनता होगी।

आइए इस गणतंत्र दिवस पर एक बार फिर से वही प्रण ले, फिर से यही वचन लें:

हम, भारत के लोग, भारत को एक
संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य
बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सबमें,
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता
सुनिश्चित कराने वाली, बंधुता बढ़ाने के लिए,
दृढ़ संकल्प होकर आज फिर से तारीख २६ जनवरी, २०१६ ई.
को एतद् द्वारा इस संविधान को
अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। 

जय हिंद! 

Tuesday, January 12, 2016

नारी: Naari...



माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “नारी ”


वो हमको इस दुनिया मे लायी
अपना अमृतमयी नीर पिलाकर पाला पोषा
अपना सुख दुख भुलाकर पूरा स्नेह लुटा दिया
हमारे हर एक आँसू, हर एक दर्द पर
वो सौ-सौ आँसू रोई है
हमारी हर एक मुस्कान पे
उसने कई कई जीवन जियें है
आज भी हमारी हर सिसकी पर
वो कुल-मुला उठती है
नारी का यह रूप ‘माँ’ सच में अतुल्य है ।।


हमारी तरह ही वो हर काम करने मे सक्षम है
फिर भी बाबू जी को एक आँख ना सुहाती है
बस लड़की होना ही उसका क़सूर है
लिखने-पढ़ने का उसका मन तो है
पर सब कहते है क़ि लड़कियाँ पढ़ कर क्या करेंगी
इसलिए ही कहने से डरती है
सुबह-शाम बस घर के ही कामों मे उलझी रहती है
घर की चार-दीवारी ही बस उसका संसार है
इस घुटे घुटे बचपन मे भी उसमे उमंगे बाकी है
राखी के दिन वो सुबह से हमारा इंतज़ार करती है
बस हमारी एक मुस्कान भर से ही वो चहक उठती है, खिल उठती है
नारी का यह रूप ‘बहन’ सच मे न्यारा है ।।


हमारा हर सुख-दुख, अब उसका भी सुख-दुख है
हमारी हर ज़िम्मेदारी, अब उसकी भी ज़िम्मेदारी है
दुख की पथरीली राहों पर वो हमारे साथ साथ चली है
कई कई बार उसने हमे संभाला है, हौसला दिया है
हमने साथ साथ जीनें और साथ साथ मरने की कसमें खाई है
जीवनसंगिनी हमारी हमसाया, हमनवा, हमराज़ है
नारी के इस रूप के बिना जिंदगी बस एक कोरा सपना है ।।


लेकिन अज़ीब से हालात हैं, एक अज़ीब घुटन सी है
यह कैसा समाज़ है, इसके सब उलटे रिवाज़ है
बेटे के जन्म पर घरों मे खुशियाँ, लेकिन
बेटी के जन्म पर मातम है
बेटे के जन्म पर पिता को बधाइयाँ और
बेटी के जन्म पर माँ को सज़ाए है
धरती मे जो बीज़ बोया जाता है वो ही पौधा अंकुरित होता है
फिर क्यों कई माताएँ आज भी पीड़ित होती है
क्यों कई बहुएँ बेटीयाँ जनने पर जला दी जाती है
इस देश मे ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ जैसे उद्घोष गूंजते है
हम वही लोग है जो दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती को पूजते है
फिर क्यों कई बेटीयों की जन्म से पहले या बाद मे हत्या कर दी जाती है
क्यों कई लड़कियों का बचपन घरों की चार-दीवारी मे क़ैद है ।।


यदि यही रहा व्यवहार पुरुष का, तो अंत निकट है
नारी बिन यह मनुज जीवन तो बस कल्पित है
यही समय है जागो, ना अपना काल बुलाओ
सृष्टि के अनमोल सृजन ‘नारी’ को ना ठुकराओ ।।


बेटी बचाओ
बेटी पढ़ाओ ।।


इसी संदर्भ मे कवि ‘द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी’ के
खंडकाव्य ‘सत्य की जीत’ से दो पंक्तियाँ :

“पुरुषों के पौरुष से ही नही बनेगी यह धरा स्वर्ग ,
चाहिए नारी का नारित्व तभी होगा यह पूरा सर्ग ।। ”

Thursday, December 31, 2015

नया साल नया सवेरा: Naya Saal Naya Savera…

भूली बिसरी यादों के साथ
समय चक्र आ पहुँचा है फिर से उसी छोर पर
जहाँ बैठकर बुने थे हमने लाखों सपने
जहाँ तय की थी हमने अपनी नई मंजिले
सारे उतार-चढ़ावों का हिसाब भी लगाया था
दोस्तों के साथ बैठकर सुख-दुख भी बाटें थे
और कैसे उस हबीब की याद मे हम खोये खोये से थे
आज भी वही आलम है, वही मंज़र है
उसके बिछड़ने का ग़म आज भी है, आज भी आँखो मे आँसू है
आज भी ज़माने का तमाशा तो वही है बस क़िरदार नये है
ना ही हमने भी अपना अंदाज़े-गुफ़्तुगू बदला
और ना ही अपनी महफ़िले बदली
बस महफ़िलों मे चेहरे नये है
शिकस्तो का जो दौर कल था वो आज भी है
नाक़िद, रकीब और ये अहदे-रिया कल भी थे और आज भी है
आगे बढ़ने के सपने आज भी वैसे ही है
लेकिन आँखों मे आज नई चमक सी है
नये सवेरे के साथ आगे बढ़ने का नया उत्साह है
मुश्किले है, पर असफलताओं ने हमारे हौसले भी बढ़ाएँ है
बस अब फिर से बढ़ चलना है
इस समय चक्र के साथ
नया जोश और नया अनुराग लिए
अपनी अपनी मंज़िलों की ओर
कर्म पथ पर, कर्म पथ पर, कर्म पथ पर… ।।

नववर्षं नवचैतन्यं ददातु ।।
शुभं  करोति  कल्याणं ।।

Friday, November 13, 2015

मन के अंधेरे मिटा ना पाये : Mann Ke Andhere Mita Naa Payee...



माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “मन के अंधेरे मिटा ना पाये”
इस दीपावली, जुर्म का शिकार हुए हज़ारों लोगो को समर्पित


हज़ारों की फुलझड़िया फूँकी
लाखों के पटाखे सुलगाए
अपने घर को तो चमकाया
पर ग़रीब की भूख मिटा ना पाये
हमने दीये तो बहुत जलाये
पर मन के अंधेरे मिटा ना पाये ।।१।।



राम को पूजा, कृष्ण को पूजा
मानवता की कसमें खाई
पर धरे रह गये सारे वादे
जात-पात-ईर्ष्या को मन से मिटा ना पाये
उसके घर मे ख़ुशी देखकर
अपने उर की ख़ुशी जलायी
गले मिले और मिठाइयाँ भी बाँटी
पर तेरा मेरा मिटा ना पाये
हमने दीये तो बहुत जलाये
पर मन के अंधेरे मिटा ना पाये ।।२।।


लाखों बच्चे भूखे सो गये
कई घरों मे मायूसी छाई
पर कैसे मनी दीवाली उनकी
जिन्होनें कई घरों के चिराग बुझाये
हाय! इन जहर बेचने वालो को क्यों शर्म ना आये
हे प्रभु इतना हृदय तो सबको देना
कि कम से कम आँखो मे पानी आये
हमने दीये तो बहुत जलाये
पर मन के अंधेरे मिटा ना पाये ।।३।।



ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||

Wednesday, November 11, 2015

आज फिर माँ ने दीये जलाये : Aaj Phir Maa Ne Diye Jalaye…

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “आज फिर माँ ने दीये जलाये”
दीपावली के इस शुभ अवसर पर सभी माताओं को समर्पित

आज रगो मे उसकी लहु दौड़ा
आज चेहरे पर उसके लाली छाई
ख़ुशियों से भरे उसके मन ने
उसके सब दुख: दर्द भुलाये
जब लौट परिंदे घर को आये 
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।1।।



परदेश मे सुख से रह रहा लाल
पर उसका दिल सदा रहे बेहाल
कैसा होगा, मेरे बिन क्या करता होगा
इसी सोच मे उसने अपने दिन रात जलाये
पर आज खुशी से झूमे मन उसका
क्या क्या उसने पकवान बनाये
जब लौट परिंदे घर को आये
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।2।।

माना प्रतीक है दीपक अंतर्मन को प्रकाशित करने का
पर आज नही छेड़ूँगा प्रसंग असुर पर देव विजय का
यह तो विषय है निश्छल, नि:स्वार्थ, और निर्मल प्रेम का
जैसे युगों पहले राम ने देश निकाला पाया
लेकिन जननी गोद की ख़ातिर स्वर्ण-तख्त ठुकराया
चौदह वर्षो तक कौशल्या की आँखों ने लहू बहाया
फिर रामवापसी पर जन-जन ने दीपों का पर्व मनाया
प्रिय-मिलन पर सबने मिलकर गीत सुमंगल गाये
जब लौट परिंदे घर को आये
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।3।।

सर्वे भवन्तु सुखिन:।।
दीपावली शुभ हो

Tuesday, October 20, 2015

शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा : Shakti Swaroopa Maa Jagdamba



शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।1।।

कांतिवान शोभा अति सुंदर भाल टीका शोभते
शंख चक्र गदा त्रिशूल धनुष खड़ग कर शोभते
सिंह बिरजती माता जन जन के कष्ट हरे
शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।2।।

प्रचंड कालिका रूप तुम धारे,  रक्तबीज दानव सब मारे
परम शक्ति रूप धरी माता,  महिषाशुर राक्षस संहारे
अन्नापूर्णा रूप माँ जब धरही,  कोटि कोटि की तृष्णा हर लेही
जब माँ शिव वाम भाग बिराजे,  सकल सृष्टि भव सागर तारे
शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।3।।

हे शैलपुत्री,  हे ब्रह्मचारिणी,  हे चंद्रघंटा नमो नम:
हे कुशमंदा,  हे स्कंदमाता,  हे कात्ययिनी नमो नम:
हे कालरात्रि,  हे महागौरी,  हे सिद्धिदात्री नमो नम:
नमो नमो नवदुर्गा मंगलकरनी बुद्धि, विवेक, ओज से भर दे
हे पापनाशनी भवतारिणी माता, उर का दानव हर ले
शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।4।।

ॐ दुर्गायै नमः।।